सेबी का बड़ा प्रस्ताव: आईपीओ और दोबारा लिस्ट होने वाले शेयरों में अब नहीं चलेगा ‘प्राइस गेम’

निवेशकों को मिलेगा सही मूल्य

कल्पना कीजिए आपने एक कंपनी के शेयर में पैसा लगाया। कंपनी की वास्तविक संपत्ति हर शेयर पर 1,578 रुपये है। लेकिन जब शेयर दोबारा बाजार में आया, तो उसकी शुरुआती कीमत मात्र 36 रुपये लगाई गई। यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं है। यह Swan Defence नाम की कंपनी के साथ वास्तव में हुआ। और यही वह घटना है जिसने भारत के बाजार नियामक सेबी को झकझोर दिया। अब सेबी ने इस पूरी व्यवस्था को बदलने का फैसला कर लिया है। नए नियमों का मसौदा तैयार हो चुका है और 11 जून 2026 तक सभी पक्षों से सुझाव मांगे गए हैं। यह बदलाव आम निवेशकों के लिए एक बड़ी राहत बन सकता है।
क्यों जरूरी पड़ा नियम बदलना?
शेयर बाजार में जब कोई नई कंपनी पहली बार सूचीबद्ध होती है या किसी पुरानी कंपनी की खरीद-बिक्री लंबे समय बाद दोबारा शुरू होती है, तो कारोबार शुरू होने से पहले एक घंटे की विशेष नीलामी प्रक्रिया होती है। यह सुबह नौ बजे से दस बजे के बीच होती है। इसी दौरान शेयर की शुरुआती कीमत तय होती है। लेकिन कुछ चालाक लोग इस प्रक्रिया का फायदा उठाते थे। वे मिलकर इस तरह बोली लगाते थे कि शेयर की शुरुआती कीमत बहुत नीचे दब जाए। फिर जब सामान्य कारोबार शुरू होता था, तो असली मांग सामने आती थी और शेयर तेजी से ऊपर जाता था। इस बीच जिन्होंने कृत्रिम तरीके से कीमत दबाई थी, वे सस्ते में शेयर खरीद लेते थे और आम निवेशक महंगे भाव पर फंस जाते थे। सेबी के पास ऐसी दर्जनों शिकायतें आ रही थीं। एक मामले में तो नीलामी के दौरान 90 प्रतिशत खरीद के आदेश केवल इसलिए रद्द हो गए क्योंकि वे तय मूल्य सीमा से बाहर थे। असली मांग सामने ही नहीं आ पाई।
नया नियम क्या कहता है :
तीन बड़े बदलाव
सेबी ने इस समस्या को जड़ से खत्म करने के लिए तीन अहम बदलाव प्रस्तावित किए हैं। पहला बदलाव : दोबारा सूचीबद्ध शेयरों की आधार कीमत कैसे तय होगी
अब तक लंबे समय से बंद पड़े शेयरों की शुरुआती कीमत अक्सर उनके अंकित मूल्य यानी 10 रुपये के आसपास तय कर दी जाती थी, चाहे कंपनी की वास्तविक संपत्ति कितनी भी ज्यादा हो। Swan Defence इसी का शिकार हुई थी। नए नियम के अनुसार अगर किसी शेयर की खरीद-बिक्री छह महीने के भीतर दोबारा शुरू हो रही है, तो उसी बाजार में या किसी दूसरे बाजार में उपलब्ध पिछली बंद कीमत को आधार बनाया जाएगा। अगर छह महीने से पुरानी कोई कीमत उपलब्ध नहीं है, तो दो स्वतंत्र प्रमाणित लेखाकार या मूल्यांकन संस्थाएं कंपनी की वर्तमान वास्तविक संपत्ति के आधार पर कीमत तय करेंगी। यह रिपोर्ट तीन महीने से अधिक पुरानी नहीं होनी चाहिए। यदि शेयर छह महीने से अधिक समय के बाद दोबारा आ रहा है, तो पूरी तरह से दो स्वतंत्र विशेषज्ञों की मूल्यांकन रिपोर्ट के आधार पर ही कीमत तय होगी। इससे Swan Defence जैसी स्थिति दोबारा नहीं होगी।
दूसरा बदलाव : मूल्य सीमा स्वचालित रूप से बढ़ेगी
शेयर की नीलामी के दौरान कीमतों के ऊपर-नीचे जाने की एक अस्थायी सीमा तय की जाती है। इसे मूल्य दायरा कहते हैं। अभी तक यह दायरा मैन्युअल तरीके से बदला जाता था, जिसमें देरी होती थी और असली मांग सामने आने में रुकावट आती थी। नए नियम के अनुसार जब भी नीलामी में संभावित कीमत इस तय सीमा के करीब पहुंचे, यह दायरा स्वचालित रूप से 10 प्रतिशत बढ़ जाएगा। यह सुविधा सुबह 9 बजकर 35 मिनट से 9 बजकर 45 मिनट के बीच की अवधि में भी लागू रहेगी, जो अभी तक प्रतिबंधित था। इससे होगा यह कि असली खरीदारों के आदेश रद्द नहीं होंगे और बाजार में वास्तविक मांग का प्रतिनिधित्व होगा।
तीसरा बदलाव : कम से कम पाँच खरीदार और पाँच विक्रेता अनिवार्य
यह सबसे महत्वपूर्ण बदलाव है। अभी तक एक भी खरीदार और एक विक्रेता के आदेश मिलने पर शेयर की शुरुआती कीमत तय हो सकती थी। इसका सीधा मतलब है कि अब केवल कुछ चुनिंदा लोगों के ऑर्डर के आधार पर शेयर की कीमत तय नहीं हो सकेगी। नए नियम में न्यूनतम पाँच अलग-अलग पहचान पत्र संख्या वाले खरीदार और पाँच अलग-अलग पहचान पत्र संख्या वाले विक्रेताओं की भागीदारी अनिवार्य होगी। तभी नीलामी प्रक्रिया सफल मानी जाएगी। अगर पहले दिन यह शर्त पूरी नहीं होती, तो दोबारा सूचीबद्ध शेयरों के मामले में नीलामी अगले कारोबारी दिन भी जारी रहेगी। यह तब तक चलेगी जब तक सही और वैध कीमत सामने नहीं आ जाती।
लघु उद्यम कंपनियों के लिए विशेष ध्यान
पिछले कुछ वर्षों में एसएमई आईपीओ में तेज उछाल देखा गया है। कई शेयर लिस्टिंग के बाद अचानक कई गुना बढ़े, जबकि कुछ मामलों में भारी उतार-चढ़ाव भी देखने को मिला। सेबी का यह प्रस्ताव लघु एवं मध्यम उद्यम कंपनियों के नए शेयरों के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इन कंपनियों के शेयरों में अभी तक मूल्य दायरा स्वचालित रूप से बदलने की कोई व्यवस्था नहीं थी। मूल्य दायरा 90 प्रतिशत नीचे से 90 प्रतिशत ऊपर तक था लेकिन इसे बदलने का अधिकार नहीं था। इन कंपनियों के शेयरों में अक्सर बहुत ज्यादा उतार-चढ़ाव देखा जाता था और छोटे निवेशक सबसे ज्यादा नुकसान उठाते थे। अब सेबी ने प्रस्ताव रखा है कि स्वचालित मूल्य दायरा विस्तार का नियम इन कंपनियों पर भी लागू हो। इससे लाखों छोटे निवेशकों को सुरक्षा मिलेगी।
निवेशकों और बाजार पर क्या होगा असर?
अगर सेबी के ये प्रस्ताव लागू होते हैं तो शेयर बाजार में कई बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। सबसे पहले, आईपीओ और दोबारा लिस्ट होने वाले शेयरों में शुरुआती दिन की असामान्य तेजी और कृत्रिम उतार-चढ़ाव कम हो सकता है। दूसरा, छोटे निवेशकों को शेयरों की अधिक वास्तविक कीमत पर निवेश का मौका मिलेगा। तीसरा, बाजार में पारदर्शिता बढ़ेगी और कीमत तय करने की प्रक्रिया ज्यादा विश्वसनीय बनेगी।
सेबी ने मांगे सुझाव, 11 जून तक दे सकेंगे राय
सेबी ने इस मसौदे पर बाजार से जुड़े सभी पक्षों, निवेशकों और विशेषज्ञों से सुझाव मांगे हैं। 11 जून 2026 तक लोग अपनी राय दे सकेंगे। इसके बाद सुझावों की समीक्षा कर अंतिम नियम जारी किए जाएंगे। संभावना है कि अंतिम नियम लागू होने के बाद भारतीय शेयर बाजार में आईपीओ और दोबारा लिस्ट होने वाले शेयरों की ट्रेडिंग व्यवस्था पहले से काफी ज्यादा मजबूत और पारदर्शी हो जाएगी।
निष्कर्ष: शेयर बाजार में भरोसा बढ़ाने की दिशा में बड़ा कदम
सेबी का यह प्रस्ताव केवल तकनीकी बदलाव नहीं है, बल्कि निवेशकों के भरोसे को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम है। पिछले कुछ वर्षों में आईपीओ और री-लिस्टेड शेयरों में जिस तरह की असामान्य हलचल देखने को मिली, उसने बाजार की पारदर्शिता पर सवाल खड़े किए थे। अब सेबी उन कमियों को दूर करने की कोशिश कर रहा है। नई व्यवस्था लागू होने के बाद शेयरों की शुरुआती कीमत ज्यादा वास्तविक तरीके से तय हो सकेगी। इससे छोटे निवेशकों को बेहतर सुरक्षा मिलेगी और बाजार में कृत्रिम खेल की संभावना कम होगी। अगर यह ढांचा सफल रहा, तो भारतीय शेयर बाजार की विश्वसनीयता और मजबूती दोनों को नया सहारा मिल सकता है।